न पक्ष, न विपक्ष सब समकक्ष, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर?

भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों, परंपरा, मान्यताओं और न्याय के सभी स्वरूपों की जितनी और जैसी दुर्दशा हुई है, वैसी पहले कभी नहीं हुई। 2014 और 2019 में भारतीय जनता पार्टी को ‘अकेले दम’ पर पूरा बहुमत मिला था, जाहिर है कि मनमानेपन के रास्ते में कोई रुकावट नहीं थी।

अभी यहां सिर्फ 2014-2023 के भाजपा के पूर्ण बहुमत वाले शासन काल से पूरे देश में त्राहि-त्राहि मचा रहा। ‘चुनावी तानाशाही’ के दौर से कोई कम बुरी स्थिति नहीं थी। आम नागरिक आपदा से जूझता रहा और शासक जमात आपदा में अवसर के जुगाड़ में लगा रहा। शासक के दोस्त पूंजी-प्रभु मुश्किल में मुनाफा बटोरते रहे! धधकती हुई चिता की लपटों में शासक के दोस्त बुद्धिजीवी रोशनी के आगमन की सूचना लोगों को देते रहे!

2019 के चुनाव नतीजों पर भी लोगों को कम अचरज नहीं हुआ था, लेकिन फिर भी लोगों ने मान लिया कि पुलवामा की आतंकी घटना का राष्ट्रवादी असर वोटरों पर पड़ा होगा। 2024 के आम चुनाव में चार सौ के पार’ की घोषणा करने वाली भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक उत्साह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत दंभ और चुनावी जुगाड़ काम नहीं आया और चार सौ के पार’ की घोषणा सामान्य बहुमत से भी पीछे सिमट कर रह गई।

जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार और तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) के एन चंद्रबाबू नायडू पर सरकार का दारोमदार टिक गया और अब तक टिका हुआ है। इस बीच, चुनाव आयोग में आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रक्रिया में ऐसी गुंजाइश बनाने में शासक दल कामयाब रहा जो चाहे जैसे भी भारतीय जनता पार्टी के लिए स्थाई रूप से पूरे बहुमत का जुगाड़ कर सके। इस का नतीजा भी सामने आने लगा!

2024 के आम चुनाव में दिखे मतदाताओं के राजनीतिक रुझान में समझ में आने लायक कारणों के बिना विधानसभाओं के चुनाव के नतीजे आये और आते चले गये! विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों का माथा ठनका! आरोप तो कई थे, लेकिन सबूत! सबूत नहीं था!

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सभी तरह की आशंकाओं को टटोलते हुए इंडिया गठबंधन के राजनीतिक हथियार के रूप में सबूत के करीब पहुंच गये! राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस करके वोटर लिस्ट में होने वाली हेरा-फेरी का खुलासा कर तहलका मचा दिया! राहुल गांधी ने जोरदार तरीके से प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से खुलासा कर दिया। गैर-भाजपा राजनीतिक दलों में तहलका मच गया।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों में स्वाभाविक  तौर पर भीतर-भीतर और इंडिया गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों में मुखर प्रतिक्रिया हुई! इन सब का राजनीतिक असर बिहार विधानसभा के चुनाव पर पड़ना ही है। बिहार में बहुत ही आकस्मिक और आक्रामक तरीका से मतदाता सूची के शुद्धी करण के लिए जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के माध्यम से लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर होने लगे, जायज और नाजायज किसी भी सवाल के प्रति लोगों का भरोसा नहीं रह गया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि सात दिन में हलफनामा नहीं मिला तो सारे आरोप झूठे हैं। मतलब खुद को आरोप मुक्त कर लिया, क्योंकि यह नहीं कहा है कि चुनाव आयोग इन आरोपों पर विचार नहीं करेगा।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि वोट तो एक मतदाता एक ही बार डाल सकता है, क्यों भाई दूसरी बार डालने से क्या शाहीनबागी करंट लगेगा? ‘सकने’ और ‘न सकने’ की बात न करें श्रीमान!

फर्जी मतदाता का आरोप वास्तविक मतदाता का अपमान नहीं करता है, बल्कि चुनाव आयोग के गलत इरादों (Malafide Intentions) का बखान करता है।  

मुख्य चुनाव आयुक्त ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए दो टूक कहा, “हलफनामा देना होगा या देश से माफी मांगनी होगी। तीसरा विकल्प नहीं है। अगर सात दिन में हलफनामा नहीं मिला तो इसका अर्थ ये होगा कि ये सारे आरोप निराधार हैं।” उन्होंने कहा, “बिना किसी सबूत के योग्य वोटर का नाम नहीं कटेगा। चुनाव आयोग हर मतदाता के साथ चट्टान की तरह खड़ा है।”

उन्होंने कहा, बिहार में 22 लाख मृत मतदाता पिछले छह महीनों में नहीं, बल्कि पिछले कई साल में बने हैं, हालांकि इसे रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया। इस तरह की बात का क्या मतलब! पिछले छह महीनों में तो कितने सालों में! संवैधानिक पद पर बैठा हुआ कोई व्यक्ति बस यों ही कुछ कह दे सकता है! यह कैसी भाषा है!

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि चुनाव आयोग के लिए न कोई पक्ष है न कोई विपक्ष, सभी समकक्ष हैं। उन्होंने कहा कि हर राजनीतिक दल का जन्म चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन से होता है, फिर चुनाव आयोग उन राजनीतिक दलों के बीच भेदभाव कैसे कर सकता है? लेकिन जवाब तो चुनाव आयोग को देना है कि भेद-भाव कैसे किया जा रहा है! नहीं किया जा सकता है लेकिन यदि भेद-भाव न होने देने के लिए जवाबदेह लोग ही राक्षसवादी रुझान से ग्रस्त हों तो कोई भी बेखौफ होकर भेद-भाव कर सकता है।

क्या हर राजनीतिक दल का जन्म चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन से होता है! भारतीय जनता पार्टी के पहले की पार्टी भारतीय जनसंघ का गठन 21 अक्तूबर, 1951 में हुआ, जबकि उस के पहले चुनाव आयोग का गठन 25 जनवरी 1950 (अब राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप  में मनाया जाता है)। लेकिन कांग्रेस का गठन तो 28 दिसम्बर 1885 को ही हो गया था! समझ में आने लायक बात यह है कि जो मुख्य चुनाव आयुक्त यह मानता है कि राजनीतिक पार्टी का जन्म चुनाव आयोग की कोख में हुआ उसे अपना और इस के बाहर की राजनीतिक पार्टी के प्रति क्यों सौतेला व्यवहार हो रहा है!

नामित BLA क्या कर रहे हैं, इस की चिंता में मुख्य चुनाव आयुक्त घुले जा रहे हैं और सारी जवाबदेही नामित BLA पर डालकर निश्चिंत होने का रास्ता तलाश रहे हैं। बूथ लेबल ऑफिसर BLO से बिल्कुल भिन्न नामित BLA का सहयोग अपने राजनीतिक दल के हितों पर नजर रखने के लिए स्वैच्छिक और बेगारी या अवैतनिक स्वभाव का होता है। बूथ लेबल ऑफिसर BLO सरकारी होता है तो फिर उनके बदले राजनीतिक दलों के नामित BLA पर जवाबदेही का बोझ डालने की कोशिश चुनाव आयोग के अपनी जवाबदेही से कन्नी काटने का ही उदाहरण नहीं है क्या!

बात-बात में किसी का भी अपमान हो जाना और किसी के भी भावनाओं का आहत हो जाना सत्ताधारी दल की राजनीतिक लौ को बढ़ाने का वाचिक-मौखिक और खास तरह का राष्ट्रवादी तरीका है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने प्रेस कांफ्रेंस में इसी खास तरह के वाचिक-मौखिक तरीके का इस्तेमाल कर रहे थे, तो गजानन माधव मुक्तिबोध की उक्ति दुहरानी ही होगी कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है! 

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं।)  

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